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Sunday, November 24, 2013

इतिहास का पन्ना - सिक्किम: एक राष्ट्र के खोने का दर्द

समकालीन तीसरी दुनिया  (सितंबर 2013)
इतिहास का पन्ना
सिक्किम: एक राष्ट्र के खोने का दर्द
सुधीर  शर्मा


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इतिहास का पन्ना - सिक्किम: एक राष्ट्र के खोने का दर्द 

पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर कालिम्पोंग नाम का एक पहाड़ी कस्वा है जहां किसी ज़माने में सारी दुनिया के खास लोग आते रहते थे। यहां के अधिकांश बाशिंदे नेपाली मूल के हैं लेकिन परंतु इस स्थान में कोर्इ बहुत आकर्षण नहीं रह गया है। लेकिन अब से कुछ सप्ताह पूर्व तक एक ऐसे देश के अंतिम प्रधानमंत्री कुछ समय तक यहां रह रहे थे जिसने अपनी आजादी से हाथ धो  दिये। 28 जुलार्इ 2007 को 103 वर्ष की उम्र में जिस काजी लेन्दुप दोरजी की मृत्यु हुर्इ उन्होंने भारत में सिक्किम के विलय में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभार्इ थी।


समकालीन इतिहास में दोरजी को एक 'गददार' के रूप में याद किया जाता है। अपने इसी कलंक के साथ उन्होंने बचा खुचा जीवन जिया और इस कलंक के साथ ही मृत्यु को प्राप्त हुए। नवंबर 1996 में जब मेरी मुलाकात उनसे कालिम्पोंग में हुर्इ तो उन्होंने मुझसे कहा-'हर आदमी मुझपर आरोप लगाता है कि मैंने अपने देश को बेच दिया। अगर यह सही है तो भी क्या अकेले मैं इसके लिए जिम्मेदार हूं? लेकिन अपनी मातृभूमि से 'विश्वासघात' का यह आरोप इतना घातक था कि दोरजी फिर कभी सक्रिय राजनीतिक जीवन में नहीं आ सके। अनेक दशकों तक उन्होंने अकेलेपन में जिंदगी के आखिरी दिन काटे।

इतना ही नहीं काजी को भारत सरकार की भी भरपूर उपेक्षा मिली। लगभग 11 वर्ष पूर्व एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने मुझे बताया -'मैंने जरूरत से ज्यादा कोशिश करके सिक्किम का भारत में विलय सुनिशिचत किया लेकिन यह काम हो जाने के बाद भारत के शासकों ने भी मेरी भरपूर उपेक्षा की... पहले जब मैं जाता था तो मेरा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया जाता था लेकिन अब जाता हूं तो दूसरीकतार के नेताओं से मिलने के लिए भी मुझे हफ़्तों इंतजार करना पड़ता है'।

सन 2000 में जब मैं दोबारा कालिम्पोंग गया तो मैंने देखा कि भारत के प्रति लेन्दुप का गुस्सा और भी ज्यादा तेज हो गया था। किसी जमाने में उनका स्वागत जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे नेता करते थे लेकिन बाद में वह एक ऐसी अनुपयोगी वस्तु बन गये थे जिनका इस्तेमाल करने के बाद कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है।

संकट की शुरुआत 

1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद सिक्किम स्टेट कांग्रेस ने, जिसका गठन जवाहर लाल नेहरू की सलाह पर हुआ था, राजतंत्रा के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की। उस समय किसी तरह सिक्किम के चोग्याल (राजा) ने संकट पर काबू पा लिया लेकिन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हिमालय के इस छोटे से राज्य के सामने जो संकट पैदा हुआ उससे वह उबर नहीं सका। 1973 में काजी लेन्दुप दोरजी के नेतृत्व वाली सिक्किम नेशनल कांग्रेस ने चोग्याल के खिलाफ जो आंदोलन शुरू किया उसके फलस्वरूप इस संप्रभु राष्ट्र का अस्तित्व ही समाप्त हो गया।

सिक्किम के राजा पाल्देन थोन्दुप नांग्याल के खिलाफ हुए आंदोलन को भारत ने खुलकर समर्थन दिया। चोग्याल के तत्कालीन एडीसी कैप्टन सोनम योंग्दा का दावा है कि विरोध प्रदर्शनों में भारतीय सेना के जवानों ने सादी वर्दी में हिस्सा लिया। कुछ प्रदर्शनकारियों को दार्जीलिंग तथा आसपास के इलाकों से बुलाया गया था। इन प्रदर्शनों में भाग लेने वाले सिक्किमवासियों की संख्या बहुत कम थी लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है।

लेन्दुप का यह आंदोलन मुख्यरूप से भारत की आर्थिक सहायता पर निर्भर था। यह पैसा उन्हें भारत का इंटेलीजेंस व्यूरो (आर्इवी) पहुंचाता था। एक रेकार्डेड इंटरव्यू में दोरजी में मुझे बताया कि 'साल में दो तीन बार आर्इवी के लोग मेरे पास आते थे। तेजपाल सेन नाम का एक आर्इवी एजेंट मुझे व्यकितगत तौर पर पैसे देता था।

दरअसल 'मिशन सिक्किम' के पीछे मुख्य भूमिका भारत के 'रा' (रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग) की थी जिसकी स्थापना 1968 में हुर्इ थी। अपनी स्थापना के तीन वर्षों के अंदर ही रा को पाकिस्तान का विभाजन करने (और बांग्लादेश बनाने) में कामयाबी मिल गयी थी। सिक्किम का विलय इसकी दूसरी 'ऐतिहासिक सफलता' थी। रा के रणनीतिकार यह नहीं चाहते थे कि भूटान जैसा वाकया सिक्किम में भी घटित हो। भूटान 1971 में संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता लेने में कामयाब हो गया था। इसलिए लेन्दुप के नेतृत्व में सिक्किम में एक आंदोलन की शुरुआत हुर्इ जिसके बारे में अशोक रैना ने अपनी पुस्तक 'इनसाइड रा: दि स्टोरी आफ इंडियाज सेक्रेट सर्विस' में विस्तार से बताया है।

रैना का कहना है कि सिक्किम को भारत में मिलाने का निर्णय नर्इ दिल्ली ने 1971 में कर लिया था और इसके बाद रा ने अगले दो वर्षों तक वह स्थितियां तैयार करने में अपना समय लगाया जिससे यह संभव हो सके। इसके लिए नेपाली मूल के सिक्कमी लोगों का इस्तेमाल किया गया जो मुख्यरूप से हिंदू धर्मं मानने वाले थे और जिन्होंने बौद्ध धर्मावलम्बी चोग्याल की तरफ से लगातार भेदभाव झेला था। गंगटोक टाइम्स के संपादक और पूर्व मंत्री  सीडी रार्इ ने बताया कि 'उस समय चोग्याल के अन्याय से त्रस्त होकर हमने सोचा कि इसका उत्पीड़न झेलने से बेहतर है कि हम भारतीय हो जायं।

लेन्दुप दोरजी काजियों के परिवार से आते थे और सत्तारूढ़ चोग्याल तथा काजियों के बीच एक ऐतिहासिक दुश्मनी थी। उन्होंने कहा कि जनता के विरोध प्रदर्शनों के जरिए उन्होंने चोग्याल पर दबाव डालने की कोशिश की लेकिन चोग्याल ने कभी समझाता नहीं किया।

दिल्ली के दबाव के कारण चोग्याल इस बात के लिए मजबूर हुए कि वह एक त्रिपक्षीय वार्ता में भाग लें जिसमें सिक्किम नेशनल कांग्रेस और भारत भी शामिल हो। इस वार्ता ने शाही अधिकारों में कटौती तो की ही इसने सिक्किम को भारत का 'संरक्षित क्षेत्र' भी बना दिया। सरकार और राजा ने एक दूसरे को दुश्मन की तरह देखना शुरू किया। आखिरकार 27 मार्च 1975 को मंत्रिमंडल की एक बैठक ने राजतंत्र को समाप्त करने का फैसला लिया। सिक्किम की संसद ने इसे मंजूरी दी और फैसला किया कि राजतंत्र के भविष्य के बारे में जनमत संग्रह कराया जाय। चार दिनों बाद देश भर के 57 स्थानों के नतीजों से यह निष्कर्ष निकला कि राजतंत्र को समाप्त कर दिया जाय।
एक इंटरव्यू में सिक्किम के कृषि मंत्री के.सी. प्रधान ने याद किया कि यह जनमत संग्रह एक मजाक था। उन्होंने बताया कि 'भारतीय सैनिकों ने मतदाताओं पर संगीनें तानी और मनमाफिक मत डलवाये'। जनमत संग्रह के तुरत बाद काजी लेन्दुप ने संसद में एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें कहा गया था कि सिक्किम को भारत में मिला दिया जाय। 32 सदस्यों की पार्लियामेंट में 31 सदस्य दोरजी की सिक्किम नेशनल कांग्रेस से थे और पलक झपकते ही यह प्रस्ताव पारित हो गया। कहने की जरूरत नहीं कि इस सारे घटनाक्रम के पीछे भारत था। उन दिनों सिक्किम में भारत के राजदूत (जिन्हें पोलिटिकल ऑफिसर कहा जाता था) बी एस दास थे। उन्होंने अपनी पुस्तक 'दि सिक्किम सागा' में लिखा- 'भारत के राष्ट्रीय हित के लिए सिक्किम का विलय जरूरी था और हमने इस उददेश्य के लिए काम किया। अगर चोग्याल थोड़ा चुस्त होते और अपना दांव कुशलता के साथ खेलते तो शायद वैसा नहीं होता जैसा हुआ।

सचमुच चोग्याल ने अपना दांव ठीक से नहीं खेला। जिन दिनों सिक्किम में उथल पुथल का माहौल था, 1974 के उस दौर में नेपाले में राजा बिरेन्द्र के राज्यारोहण समारोह में भाग लेने चोग्याल काठमांडू आये थे। महल के नजदीकी लोगों का कहना है कि राजा बिरेन्द्र, चीन के उप प्रधनमंत्री चेन ली यान और पाकिस्तान के राजदूत ने चोग्याल को सलाह दी कि वह वापस सिक्किम न लौटें। कैप्टन योंग्दा का कहना है कि 'इन तीनों लोगों ने सिक्किम को भारत के चंगुल से बचाने के लिए एक योजना बतायी लेकिन चोग्याल मानने को तैयार नहीं हुए।
इसकी वजह यह थी कि उन्होंने सपने में भी यह नहीं सोचा था कि सिक्किम को हड़पने के लिए भारत ताकत का इस्तेमाल करेगा।

दोहरी चाल

दरअसल भारत एक दोहरी चाल चल रहा था। एक तरफ तो वह चोग्याल के खिलाफ लेन्दुप को हर तरह की मदद दे रहा था और दूसरी तरफ चोग्याल को आश्वासन देता था कि राजतंत्र बरकरार रहेगा। चोग्याल को भारतीय सेना में आनरेरी मेजर जनरल का पदमिला हुआ था और उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि उनकी 'खुद की सेना' उनके खिलाफ काम करेगी। अंतत: यह एक भ्रम साबित हुआ।

6 अप्रैल 1975 को एकदम सवेरे चोग्याल अपने महल में थे कि तभी उन्हें सेना के ट्रकों की गड़गड़ाहट सुनार्इ दी जो नीचे से उपर की ओर बढ़ते चले आ रहे थे। वह लपक कर अपनी खिड़की के पास पहुंचे। उन्होंने देखा कि चारो तरफ भारतीय सैनिक हैं और उन्होंने महल को घेर लिया है। इसके बाद मशीन गन से गोलियों के चलने की आवाज आयी। महल के मुख्य दरवाजे पर तैनात 19 वर्षीय गार्ड बसंत कुमार क्षेत्री को एक गोली लगी और वह मारा गया। भारतीय सेना के पांच हजार जवानों को महल के 243 रक्षकों पर काबू पाने में आध घंटा से अधिक समय नहीं लगा। दोपहर के 12 बजते बजते सब कुछ शांत हो चुका था। सिक्किम अब एक स्वतंत्र राज्य का अस्तित्व खो चुका था।

चोग्याल ने दूसरा अवसर भी खो दिया था। महल के रक्षकों के पास इतनी क्षमता थी कि वे भारतीय सेना को दो घंटे तक उलझाये रख सकें। अगर चोग्याल ने अपने ट्रांसमीटर सेट से चीन और पाकिस्तान को इस हमले की जानकारी दी होती तो जैसा कि काठमांडो की मुलाकात में इन दोनों देशों ने आश्वासन दिया था, दोनों अपने सुरक्षा बलों को भारत से लगी सीमा पर गोलीबारी का निर्देश दे देते। चीनी सेना शायद चोग्याल को बचाने गंगटोक तक भी पहुंच सकती थी।

महल के रक्षकों को बंदी बना लिया गया, उनके हाथ बांध् दिये गये और उन्हें ट्रकों में भर दिया गया जिसमें से उनके नारों की आवाज बाहर आ रही थी 'डेला सिल, ली गी, गंग छांगा छिबसो' (हमारा देश फूल की तरह हमेशा खिलता रहे)। लेकिन उस समय तक महल के उपर सिक्किम के झंडे को हटाकर तिरंगा लहरा दिया गया था और नांग्याल वंश के 12वें राजा को बंदी बना लिया गया था। कैप्टन सोनम यांग्दा ने बताया कि 'चोग्याल भारत के बहुत प्रशंसक थे। महात्मा गांधी और जवाहर लाल के प्रति उनके दिल में बेहद सम्मान था। उन्होंने कभी यह सोचा ही नहीं था कि भारत उनके राज्य को ले लेगा। नेहरू ने खुद 1960 में पत्रकार कुलदीप नैयर से कहा था- 'सिक्किम जैसे छोटे देश को ताकत के बल पर लेना वैसा ही है जैसे मक्खी मारने के लिए राइफल का इस्तेमाल किया जाय। कैसी विडंबना है कि नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी ने ही 'राष्ट्रीय हित को ध्यान' में रखते हुए सिक्किम को भारतीय संघ का 22वां राज्य बना दिया।

इस बीच नर्इ दिल्ली में इंदिरा गांधी लगातार मजबूत होती जा रही थीं। 1971 के बांग्ला देश युद्ध और 1974 के परमाणु परीक्षण ने उनके अंदर यह आत्मविश्वास पैदा कर दिया कि सिक्किम को वह हमेशा के लिए निपटा दें। इंदिरा गांधी की चिंता थी कि हो सकता है कि सिक्किम भी स्वतंत्र रुझानों का प्रदर्शन करे और भूटान की तरह वह भी संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता ले ले। इसके अलावा वह इस बात से भी बहुत खिन्न रहती थीं कि हिमालय क्षेत्र के तीनों देश भूटान, सिक्किम और नेपाल एक दूसरे के करीब आते जा रहे हैं।

जिस समय भारतीय सेना ने गंगटोक की सड़कों पर प्रवेश किया, जनता ने जबर्दस्त ढंग से उसका स्वागत किया। अगर कहीं विक्षोभ था तो वह दूर काठमांडो तक सीमित था। चीन ने भी अपनी चिंता का इजहार किया। लेकिन भारतीय सेना के खिलाफ किसी तरह के विरोध् के अभाव में संयुक्त राष्ट्र में भी कोर्इ खास प्रतिक्रिया नहीं देखने को मिली। काफी बाद में विरोधी विचार सुनार्इ देने लगे और 1978 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसार्इ ने कहा कि सिक्किम का विलय एक गलती थी। यहां तक कि सिक्किम के राजनीतिक नेताओं ने भी, जिन्होंने विलय के लिए संघर्ष किया था, इसे एक बहुत बड़ी भूल कहा और कोशिश की कि पुरानी स्थिति वापस आ जाय। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

काजी लेन्दुप दोरजी भारतीय राज्य सिक्किम के पहले मुख्यमंत्री बने और 1979 तक वह इस पद पर बने रहे। भारत सरकार ने 2002 में उन्हें पदम भूषण के सम्मान से नवाजा।

1979 में सिक्किम में हुए चुनाव में लेन्दुप दोरजी की पार्टी सिक्किम नेशनल कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। उनका राजनीतिक जीवन पूरी तरह समाप्त हो चुका था। 400 वर्ष पुराने चोग्याल वंश को समाप्त करने के उनके संकल्प ने उनकी मातृभूमि को ही भारत की गोद में डाल दिया। बदले में उन्हें मिला एक कलंकित जीवन।

(लेखक काठमांडो से प्रकाशित 'दैनिक कांतिपुर' के संपादक हैं। उनका यह लेख 2008 में प्रकाशित हुआ था)

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